September 23, 2010

चिराग़े-मुर्दः हूँ मैं बेज़बाँ गोरे गरीबाँ का : मिर्ज़ा ग़ालिब

सताइशगर है ज़ाहिद इस क़दर जिस बाग़े-रिज्वॉ का,
वह इक गुलदस्तः है हम बेख़ुदों के ताक़े-निसियाँ का ।


मतलब जिस ज़ाहिद (परहेज़गार, संयमी) जिस स्वर्गोद्यान की इतनी प्रशंसा करता है और हमें प्रलोभन देकर उधर आकर्षित करना चाहता है, हमारे-जैसे बेख़ुद लोग उसकी परवाह भी नहीं करते, उसे रखकर भूल जाते हैं ।
इसमें ताक़े-निसियाँ का अर्थ वह ताक जिस पर कुछ रखकर भूल जाएँ । प्रायः गुलदस्ता ताक़ में ही सजाया जाता है ।

ख़ामोशी में निहाँ खूँगश्तः लाखों आरजुएँ हैं,
चिराग़े-मुर्दः हूँ मैं बेज़बाँ गोरे गरीबाँ का ।


"जिस प्रकार परदेसियों और पथिकों की क़ब्रों के बुझे हुए दीपक उनकी लाखों कामनाओं को अपने कलेजे में छिपाए होते हैं वैसे ही मेरे मौन में भी रक्तरंजित लाखों कामनाएँ निहित है ।" यहाँ चिराग़े-मुर्दः का मतलब बुझा हुआ या मौन दीपक से है ।

September 10, 2010

सेहरा : ग़ालिब

फूलों या सुनहरे-रुपहले तारों की झालर जो विवाह के समय वर के सिर पर बाँधी जाती है । उसकी प्रशंसा में जिस काव्य की रचना की जाती है, उसको भी सेहरा कहते हैं । शहजादः जवान बख्त का निकाह 1 अप्रैल, 1853 को हुआ था। उस समय ग़ालिब ने यह सेहरा कहा था ।


सेहरा
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ख़ुश हो गए ऐ बख्त ! कि है आज तेरे सर सेहरा,
बाँध शहजादः जवाँबख्त के सर पर सेहरा ।
क्या ही इस चाँद से मुखड़े प भला लगता है,
है तेरे हुस्न दिल अफ़रोज़ का ज़ेवर सेहरा ।
सर पर चढ़ना तुझे फबता है, पर ऐ तर्फ़ेकुलाह,
मुझको डर है, कि न छीने तेरा लम्बर चेहरा ।
नाव भरकर ही पिरोये गए होंगे मोती,
वर्न: क्यों लाये हैं कश्ती में लगाकर सेहरा ।
सात दरिया के फ़राहम किये होंगे मोती,
तब बना होगा इस अंदाज़ का गज़भर चेहरा ।
रुख प दूल्हा के जो गर्मी से पसीनः टपका,
है रगे-अब्रे-गुहरबार सरासर सेहरा ।
यह भी एक बेअदबी थी कि क़बा से बढ़ जाए,
रह गया आन के दामन के बराबर सेहरा ।
जी में इतराएँ न मोती, कि हमीं हैं एक चीज़,
चाहिए फूलों का भी एक मुक़र्रर सेहरा ।
जब कि अपने में समावें न ख़ुशी के मारे,
गूँथे फूलों का भला फिर क्योंकर सेहरा ।
रुख़े-रोशन की दमक, गौहरे-गलताँ की चमक,
क्यों न दिखलाए फरोगे महो-अख्तर सेहरा ।
हम सुख़नफ़हम हैं, ग़ालिब के तरफ़दार नहीं,
देखें, इस सेहरे से कह दे कोई बेहतर सेहरा ।


* अफ़रोज़ = ह्रदय खिलानेवाली, तर्फ़ेकुलाह = टोपी की ओर, फ़राहम = संचित, रगे-अब्रे-गुहरबार = मोती बरसाने वाला बादल, क़बा = चोंगा

August 06, 2010

मिर्ज़ा ग़ालिब की गज़लें

न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता,
डुबोया मुझको होने ने न मैं होता तो क्या होता !
हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है,
वह हर एक बात पर कहना कि यों होता तो क्या होता ।


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बिजली इक कौंद गयी आँखों के आगे तो क्या,
बात करते कि मैं लब तश्नए-तक़रीर भी था ।
पकड़े जाते हैं फरिश्तों के लिखे पर नाहक़,
आदमी कोई हमारा, दमे-तहरीर भी था ?

ग़ज़ल : ग़ालिब

बूए-गुल, नालए-दिल, दूदे चिराग़े महफ़िल
जो तेरी बज़्म से निकला सो परीशाँ निकला ।
चन्द तसवीरें-बुताँ चन्द हसीनों के ख़ुतूत,
बाद मरने के मेरे घर से यह सामाँ निकला ।


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इश्क़ से तबियत ने ज़ीस्त का मज़ा पाया,
दर्द की दवा पायी, दर्द बेदवा पाया ।
हाले-दिल नहीं मालूम लेकिन इस क़दर यानी,
हमने बारहा ढूँढा तुमने बारहा पाया ।
शोरे-पन्दे-नासेह ने ज़ख्म पर नामक छिड़का,
आपसे कोई पूछे, तुमने क्या मज़ा पाया ।

July 01, 2010

दिल्ली और लखनऊ की ज़बान : मिर्ज़ा ग़ालिब

एक बार लखनऊ की गोष्ठी में मिर्ज़ा मौजूद थे, लखनऊ और दिल्ली की ज़बान पर बात चल निकली । एक सज्जन ने मिर्ज़ा से कहा कि जिस अवसर पर दिल्ली वाले 'अपने तई' बोलते हैं वहाँ लखनऊ के लोग 'आपको' बोलते हैं । मिर्ज़ा आपकी राय में शुद्ध 'आपको' है या 'अपने तई' ? मिर्ज़ा बोले, "फ़सीह (शुद्ध) तो वह मालूम होता है जो आप बोलते हैं , मगर दिक्कत यह है कि मसलन आपकी ही निस्बत यह अर्ज़ करूँ कि मैं तो 'आपको' कुत्ते से भी बदतर समझता हूँ, तो सख्त मुश्किल बात होगी । मैं तो अपनी निस्बत कहूँगा और मुमकिन है कि आप अपनी निस्बत समझ जाएँ ।" वहाँ उपस्थित सभी लोग इसे सुनकर फड़क उठे कि क्या जवाब दिया है और कैसा प्रच्छन्न व्यंग्य किया है । इस तरह मिर्ज़ा के कई किस्से मशहूर हैं ।